तारीख पर तारीख: FIR Against Advocate By Karkardooma Court Delhi

 जल्द सुनवाई न होने से राकेश नाराज था। उसने अदालत में रखे कंप्यूटर व अन्य सामान को तोड़ दिया। 




यह असामान्य घटना 17 जुलाई को कोर्ट परिसर में अदालत संख्या 66 में हुई थी। शास्त्री नगर का रहने वाला राकेश नाम का एक शख्स 2016 से लंबित अपने मामले से नाराज था। सूत्रों का हवाला देते हुए बताया कि हाल ही में कड़कड़डूमा कोर्ट में एक असामान्य फिल्मी दृश्य देखा गया, जब दिल्ली के एक निवासी ने बॉलीवुड अभिनेता सनी देओल का फेमस डायलॉग तारीख पर तारीख (फिल्म दामिनी से) चिल्लाना शुरू कर दिया।

यह घटना कथित तौर पर 17 जुलाई को दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में कोर्ट रूम नंबर 66 में हुई। व्यक्ति ने आरोप लगाया कि अदालत केवल सुनवाई के लिए तारीखें दे रही है, जिससे न्याय की प्रक्रिया में देरी हो रही है।

पुलिस ने उस व्यक्ति की पहचान दिल्ली निवासी राकेश के रूप में की है, जिसका मामला कथित तौर पर कड़कड़डूमा अदालत में वर्ष 2016 से लंबित है।

हंगामे के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और एक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जिसने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

दिल्ली पुलिस ने राकेश पर धारा 186 (किसी भी लोक सेवक को उसके सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन में स्वेच्छा से बाधा डालना), धारा 353 (लोक सेवक के खिलाफ किसी भी व्यक्ति द्वारा हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), धारा 427 (शरारत) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया है।


'दामिनी' राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित एक प्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म है, जिसमें मीनाक्षी शेषाद्री ने मुख्य भूमिका में सनी देओल, ऋषि कपूर, अमरीश पुरी, परेश रावल के साथ शीर्षक भूमिका निभाई है।

सनी देओल, जो फिल्म में एक वकील की भूमिका निभा रहे हैं, तारीख पर तारीख चिल्लाते हुए विरोधी वकील (दिवंगत अमरीश पुरी द्वारा अभिनीत) द्वारा मांगे गए नियमित स्थगन पर अपना गुस्सा निकालते हैं।

फिल्म में सुनवाई के दौरान जब जज ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें मामले में एक और तारीख देनी चाहिए तो देओल कहते हैं,

"आज आप फिर से एक और तारीख दे रहे हो। इस तारीख से पहले कोई ट्रक आकर मुझे टक्कर मार देगी और मामला सड़क दुर्घटना घोषित हो जाएगा और फिर क्या? आप फिर से तारीख दोगे। लेकिन उस तारीख से पहले, दामिनी को पागल घोषित कर दिया जाएगा और पागलखाने में डाल दिया जाएगा और इस तरह, सच्चाई के लिए लड़ने वाला कोई नहीं होगा, न ही कोई न्याय मांगने वाला होगा। माय लॉर्ड जो कुछ बचा है वह एक तारीख है और यह हमेशा से चला आ रहा है। तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख। न्याय के नाम पर अब तक हमें बस इतना ही मिला है। हमें बस एक तारीख मिलती है। माय लॉर्ड, वकीलों ने इन तिथियों का इस्तेमाल न्याय के खिलाफ एक हथियार के रूप में किया है।"

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिकित्सा उपचार के दौरान पत्नी की मृत्यु पर दु:ख व्यक्त करते हुए फेसबुक पर पोस्ट लिखने वाले शख्स के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई

Update: 2021-07-24 05:49 GMT
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिकित्सा उपचार के दौरान पत्नी की मृत्यु पर दु:ख व्यक्त करते हुए फेसबुक पर पोस्ट लिखने वाले शख्स के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी, जिस पर एक सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी पत्नी की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए फेसबुक पर पोस्ट लिखने खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की पीठ अशोक गौतम की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसके खिलाफ एक फेसबुक पोस्ट से संबंधित आरोप के मामले में कार्यवाही शुरू की गई है।

याचिकाकर्ता ने अपनी पोस्ट में चिकित्सा उपचार के दौरान अपनी पत्नी की मृत्यु पर दुख व्यक्त किया और इसके बाद याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 504, 507 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66,67-ए और उत्तर प्रदेश मेडिकेयर सेवा व्यक्ति और चिकित्सा सेवा संस्थान (हिंसा की रोकथाम और संपत्ति को नुकसान) अधिनियम की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया गया।

गौतम की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि आवेदक ने 21 सितंबर, 2020 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिला मेरठ को चिकित्सा उपचार के दौरान अपनी पत्नी की मौत से संबंधित मामले के संबंध में एक शिकायत की थी।

इसलिए यह प्रस्तुत किया गया कि पूरी कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण है और केवल उसे परेशान करने की दृष्टि से है।

कोर्ट ने देखा कि प्रथम दृष्टया मामले पर विचार करने की आवश्यकता है। न्यायालय ने 1 सितंबर, 2021 तक राज्य को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया।

इस बीच सूचीबद्ध करने की अगली तिथि तक अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-प्रथम मेरठ की अदालत में लंबित आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी गयी है।

कोर्ट ने हाल ही में कहा था कि COVID-19 प्रोटोकॉल के उल्लंघन के बारे में समाज के निवासी द्वारा एक सतर्क ट्वीट सीआरपीसी की धारा 144 के तहत पारित निषेधात्मक आदेशों का उल्लंघन नहीं हो सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था जिसने ट्वीट किया था कि नौकरानियां बिना हाथों को सेनिटाइज किए उसके सोसायटी में आती हैं।

न्यायमूर्ति जे जे मुनीर की खंडपीठ ने कहा था कि COVID-19 प्रोटोकॉल के उल्लंघन के बारे में एक जानकारी जिसकी जांच जरूरी है, गलत पाई जा सकती है और पुलिस को गलत जानकारी देने के बारे में किसी भी अपराध को जन्म नहीं दे सकती है।

केस का शीर्षक - अशोक कुमार गौतम बनाम यू.पी. राज्य एंड अन्य

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:

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